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लेख लिखे माटी ने

देवेन्द्र सफल

प्रकाशक : दीक्षा प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2019
पृष्ठ :110
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 16020
आईएसबीएन :000000000

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देवेन्द्र सफल का गीत-संग्रह

आत्मकथ्य

मनुष्य ने जब से सोचना शुरू किया राग-द्वेश, क्रोध, क्षमा, दया, ममता, करुणा ने हमेशा ही उस के मन को उद्वेलित किया है। आदिकाल से ही वह अपने मनोभावों को कविता में व्यक्त करता आया है, जिसका सहज-सरस स्वरूप गीत है।

गीत, नवगीत, जनगीत, नवान्तर गीत या अन्य किसी नाम से पुकारे जाने के बावजूद गीत कई पड़ावों को पार करते हुए अनवरत यात्रा जारी रखे है। आज का गीत युगीन लोक काव्य-संचेतना से सम्पृक्त है। जिन्दगी की तेज रफ्तार, शहरीकरण, गाँव से पलायन, संस्कारों का क्षरण, पारिवारिक विखण्डन, आर्थिक समृद्धि की चकाचौंध ने गाँवों और शहरों को बहुत गहराई से प्रभावित किया है। देश के नीति-नियामकों की अदूरदर्शितापूर्ण नीतियाँ, भ्रष्टाचार, जाति-वर्ग, भाषा, क्षेत्रीय संकीर्णता और आर्थिक विकेन्द्रीकरण, वैश्वीकरण तथा बाजारवाद ने आज भारतीय जन-मानस को झकझोर कर रख दिया है जिस का सीधा प्रभाव आज की कविता पर भी साफ देखा जा सकता है। आज का गीत अपने रूढ़ दायरे से निकल कण्टकाकीर्ण और खुरदरे पथ पर अग्रसर होने के साथ ही लोक-संस्कृति को गहराई से परखने का उपक्रम कर रहा है।

'लेख लिखे माटी ने' गीत-संग्रह के गीतों में मानव-मन की विभिन्न स्थितियों का अंकन हुआ है। जीवन मूल्यों की जटिलताओं और आपाधापी से आक्रान्त होने के बावजूद मैंने अपने गीतों में उलझाव भरे कथ्यों, बिम्बों एवं प्रतीकों से बचने की कोशिश की है। अनायास उद्भूत भावों एवं विचारों के संगुम्फन को गीत के रूप में पिरो कर सुधी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने का यह एक छोटा-सा प्रयास है।

मेरे प्रथम गीत-संग्रह 'पखेरू गंध के' (1998) और दूसरे गीत-संग्रह 'नवान्तर' - (2007) को आप के द्वारा प्रदत्त स्नेह से उत्साहित होकर अपना तीसरा गीत-संग्रह 'लेख लिखे माटी ने - को आप के समक्ष प्रस्तुत करते हुए अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है।

मेरे काव्य-गुरु परम आदरणीय प्रो0 रामस्वरूप सिन्दूर का आत्मिक स्नेह एवं आशीर्वाद मेरे साथ है। अग्रज गीतकवि डॉ० कुमार रवीन्द्र और डॉ0 वेद प्रकाश अमिताभ का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने अपनी व्यस्तताओं के मध्य मेरे गीत-संग्रह 'लेख लिखे माटी ने' - पर अपना अभिमत देकर मझे कृतार्थ किया है। यदि इस गीत-संग्रह की कुछ पंक्तियाँ भी सुधी पाठकों के अभ्यन्तर को छूने में सफल हुईं तो मैं अपने को धन्य समयूँगा।

सहधर्मिणी श्रीमती गीता शुक्ला और पुत्र अविजित शुक्ल तथा सुरभित शुक्ल का भी आभार व्यक्त करता हूँ कि जिन के सक्रिय सहयोग से यह गीतसंग्रह समय से प्रकाशित हो सका।

-- देवेन्द्र सफल


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    अनुक्रम

  1. आत्मकथ्य
  2. अनुक्रम

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